अम्बा ये मोरी बाल्ही बुड़द विशेष !

!! बाल्ही खुङद बिशेष, जठै इन्दरेश बिराजै सा ! मानदानजी कविया दीपपुरा !!
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!! दौहा !!

नैणां खुरद्द निहार स्यू,
दरषण करस्यूं आय !
वो रवि ऐसो उगसी,
सोनां हूंत सवाय !!

सुणज्यो माँ श्रवणां सगत,
वाणी मुझ विषेश !
नैणां खुद दिखावज्यौ,
अब तो माँ इन्द्रेश !!

!! सवैया !!

चार छ वै नव ऐक के संवत
साढ मनूँ शुकला पख थाई !
नौमिय तित्थ भृगू शुभ वासर
सागर के घर तूं प्रगटाई !
आज कऴू मे धिनो हद आसत
भासत आवङ रूप बिजाई !
मान कति शकती विपती हरि
भूल रती मत इन्दर बाई !!

अम्बा ये मोरी बाल्ही बुड़द विशेष !
जठै तो इन्द्रेश विराजै सा !! टेर !!

साक्षात ही आवड शकति,
बात विरद विख्याति !
जात सुधारण जनमियां,
पात जपत परभाति !!1!!

करनी ज्यू प्रगटी कला,
धरणी पर हद धाम !
हरनी संकट बीस हथी,
सेवग सरणी काम !!2!!

जगदम्बा सब जगत के,
अवलम्बा हो आप !
लम्बा भुज गुण कुण लखे,
अम्बा सुजस अमाप !!3!!

विपति विडारण बीदगाँ,
सारण कज सुरराय !
ब्रण चारण री बाहरू,
मारण दुष्टां माय !!4!!

संमद सुता सेवक सुखद,
धजबंद श्रव साधार !
इन्दु आरती पूरवण,
बन्दु मैं बारम्बार !!5!!

तूं त्राता त्रिंहूं लोकरी,
दाता सुख वरदान !
अनदाता शरण अभै,
माता कवियो “मान” !!6!!

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