भगवान ब्रह्माजी से संबंधित मान्यताएँ :-

       श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्द के 10 वे अध्याय के 27 वे श्लोक में कहा गया हैं कि विदुर ने मैत्रेय ऋषि से पूछा कि परम पिता ब्रह्मा ने कितने प्रकार की सृष्टि की रचना की थी, इस पर मैत्रेय ने जो उत्तर दिया वह इस प्रकार से हैं।

श्लोक

देवसर्गश्र्वाष्ठविधो विवुधाः पितरोऽसुराः।

गन्धर्वाप्सरसः सिद्धा यक्षरक्षांसि चारणाः।।

भूतप्रेतपिशाचाश्व विद्याधराः किन्नरादयः।।।

      अर्थात् देवताओं की उत्पत्ति आठ तरह से इस प्रकार हैं, कि प्रथम देवता; दूसरे पितृ; तीसरे दैत्य; चौथे गन्धर्व और अप्सर; पांचवे यक्ष और राक्षस, छठे भूत, प्रेत और पिशाच; सातवें सिद्ध, चारण तथा विद्याधर; और आठवे किन्नरादि। इस तरह से देवसर्ग का उपरोक्त क्रम श्रीधरी की टीका के अनुसार बताया गया हैं। इस प्रमाण के आधार पर चारणों की उत्पत्ति देवसर्ग से हुई, इस जाति का व्यवहार देवता व ऋषियों के तुल्य उत्तम बना रहा जिसके प्रमाण पौराणिक धार्मिक ग्रंथों में देखने को मिलते हैं।

    ब्रह्माजी के पुत्र कश्यप से चारणों की उत्त्पति :- गणेश पुराण के उपासना खण्ड़ के 100 वे श्लोक के अनुसार

क्रमणे किन्नरा यक्षासिद्धश्चारणा गुह्यका।

पशवश्र्व तथारण्याग्रम्याश्र्वा सन्नेकश :।।

    चारण ब्रह्माजी के पुत्र कश्यप की संतान थे। गणेश पुराण के उपासना खण्ड़ के 100 श्लोक के अनुसार चारणों की उत्त्पति कश्यप और उनकी पत्नी अरिष्ठायी से होने की जानकारी मिलती हैं।

     भारत वर्ष के उत्तर दिशा में दुनिया के सब पहाड़ों से ऊँचा सुमेरू पर्वत आया हुआ हैं। जिस पर देवता आबाद हुए। उन देवताओं के देश यानि मुल्क को देवलोक और स्वर्ग कहा जाता था और मनुष्य जमीन पर आबाद हुए। इन मनुष्यों के देश यानि मुल्क को मृत्युलोक कहते हैं।

    सुमेरू पर बीच में तो सब के पिता ब्रह्माजी की पुरी हैं, उसके चारों तरफ दूसरे देवताओं की अलग-अलग पुरियां हैं। इसका उल्लेख श्रीमद्भागवत में पंचम स्कन्ध के सोलहवें अध्याय में हुआ हैं।

मेरोर्मूर्द्धनि भगवत आत्मयोनेर्मध्यत उपक्लृप्तांक पुरीम्।

     अर्थः-सुमेरू के मस्तक पर यानी सबसे ऊँचे शिखर पर ब्रह्माजी की पुरी सबके बीच में हैं। उस सुमेरू पर्वत पर चारण देवताओं की भी पुरी हैं, उसके बारे में श्रीमद्भागवत में पंचम स्कन्ध के चौबीसवें अध्याय में लिखा हैं।

अधस्तात्सवितुर्योजनायुते स्वर्मानुर्नक्षत्रवच्चरतीत्ये के ।।

ततोऽ धस्तासित्सद्ध चारण विद्याधराणां सदनामि तावन्मात्र एव।।

      अर्थ:- सूर्य के दस हजार योजन नीचे राहु नक्षत्र की तरह भ्रमण करता हैं, ऐसा बहुत से ज्ञानी लोग कहते हैं। इससे उतना ही नीचे यानी राहु से दस हजार योजन नीचे सिद्ध चारण और विद्याधरों का निवास स्थान हैं। इन तीनों का एक सर्ग हैं, हिन्दू विद्वानों ने इस सुमेरू पर्वत की ऊँचाई का नाप ऊपर की ओर से सूर्य से किया हैं, और यूरोपियन आलिमों ने पर्वत की ऊँचाई का नाप नीचे की तरफ से समुद्र के तल से किया हैं।

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