भगवान शिवजी से संबंधित मान्यताएँ :-

       परमेश्वर की भक्ति करने के लिए आर्यावर्त से बढकर कोई स्थान नहीं हैं। इसलिए अमरकोश ग्रंथ में कहा गया हैं।

आर्यावर्तः पुण्यभूर्मिर्मध्यं न्ध्यिहिमागयोः।

   अर्थ :- हिमालय से लेकर विंध्य पर्वत तक आर्यावर्त हैं। इस आर्यावर्त को पुण्यभूमि कहा गया हैं। भारतवर्ष में भी हिमालय पर्वत हैं। यह पर्वत सबसे सुन्दर और एकान्त स्थल हैं, इसलिए कई देवताओं के साथ सिद्ध और चारण भी तपस्या करने के लिए हिमालय पर्वत पर आकर बस गये। हिमालय में शिवजी भी रहते थे।

   रिपोर्ट :-मरदुमशुमारी राजमारवाड़ 1891 ई. (रायबहादुर मुंशी हरदयालसिंह) पुस्तक के पृ.सं. 347 पर आईन अकबरी के हवाले से लिखा हुआ हैं कि “महादेवजी ने अपने लिलाट के पसीने से चारण नाम 1 आदमी को पैदा करके अपने नंदी की सेवा पर रक्खा वह कवित्त कहता था अस्तुति करता था और अगले पिछले हाल की भी खबर देता था उसकी औलाद का नाम भी चारण हुआ”

     महादेवजी द्वारा उत्पन्न चारण ने पार्वती की स्तुति की। इस पर पार्वती ने खुश होकर कहा कि “जा नांदिये को चराला मेरा सिंघ कुछ नहीं करेगा और तूने मेरी स्तुति की जिसके प्रताप से तेरी संतान बिना लिखे पढ़े ही कविता किया करेगी”

     देवताओं के कवि चारण देवता देवलोक में सुमेरू पर्वत पर आबाद हुए थे तब तो वे देव चारण कहलाते थे जब हिमालय की पुत्री पार्वती का महादेवजी के साथ विवाह हुआ तब तैयारी के लिए ब्रहमाजी ने हिमालय में नवीन नगर बसाया उस नगर में देवता वगैरह सभी आये। इसका उल्लेख ब्रह्म पुराण के 36 वे अध्याय के 66 श्लोक में आया हैं।

श्लोक

गन्धर्वाप्सरजः सर्वे नागा यक्षा सराक्षसा ।

औदका : खेचराश्चान्ये किन्नरा देव चारणा ।।

       अर्थ :- उस नगर में गंधर्व, अप्सराएं, नाग, यक्ष, राक्षस, जलचर यानि जल में रहने वाले, खेचर यानि आकाश में रहने वाले इनके सिवाय किन्नर और देवचारण आये। देव चारणों में से कितनेक मोक्ष साधन के लिए सुमेरू पर्वत से आकर हिमालय पर्वत पर आकर आबाद हुए उनकी औलाद मृत्युलोक निवासी यानि मृत्युलोक के वाशिन्दे हो जाने से उनके देवतापन में इतनी कमी हुई कि वे देवकल्प कहलाने लगे। देवकल्प अर्थात् देवताओं से कुछ न्यून।

         महाभारत के आदिपर्व के 126 वे अध्याय के 5 श्लोक में आया हैं कि राजा पाण्डू हिमालय में चारणों के नजदीक तप करता था, उनकी वहीं पर मृत्यु हो गई। तब चारण उसकी रानी और राजकुमारों को हस्तिनापुर पहुँचाने की सलाह करने लगे। उन देवकल्प महाऋषि चारणों ने आपस में सलाह की। देवकल्प अर्थात् देवता सदृश। समान गुणवालों में अधिक गुण वाले की मिसाल दूसरे को दी जाती हैं।

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